Saturday, 6 May 2017

देश का चौथा स्तंभ क्यों है देश के विकास के खिलाफ।


25 मार्च 1931 में कानपुर में दंगे हो रहे थे।उस समय के सबसे निर्भीक और स्वतंत्र् पत्रकारों में से एक श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी,जो की अपनी कलम से ना सिर्फ अंग्रेज़ो के बल्कि अपने स्वार्थ की राजनीति करने वाले अपने लोगो के खिलाफ भी मोर्चा खोल रखा था,उन्होंने ये अपना कर्तव्य समझा,की मैं गलत अपनी आँखों के सामने होता नहीं देख सकता,चाहे वो अपने लोग ही क्यों ना कर रहे हों।वो अपनी प्रेस से निकल के उस गली में जहां भयानक हिंसा हो रही थी पहुँच गए।लोगों के हथियारों वाले हाथों को रोक कर हाथ जोड़ कर उनको शांत कराने लगे।इसी बीच कुछ सरफिरों ने उनपर भी वार कर दिया जिससे वो मरणावस्था में पहुँच गए।आखिरी पलों में भी वो सभी लोगो से इस संहार को रोकने में लगे रहे।उनकी सहादत के बाद गांधीजी ने कहा - "विद्यार्थी जी की इस एक मौत के बदले मैं अपनी सौ ज़िन्दगी कुर्बान करने को तैयार हूँ।" आज 2017 में भी स्वघोषित निर्भीक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।उनके लेखों और कार्यक्रमों को देखो तो क्या वो विद्यार्थी जी के कहीं आसपास भी नज़र आएंगे ? 

     पत्रकारिता और पत्रकार चौथा स्तंम्भ सिर्फ इसलिए होते हैं क्योंकि वो जनता और सरकार के बीच में पुल का काम करते हैं।जो भी जनता के अंतर-मन में संसय और समस्या होती है वो पत्रकार सीधे सरकार को अपने सब्दों में पूछता है।उन सवालों को सुनते-देखते-पढ़ते हुए जनता खुद को ताकतवर समझती है।ऐसे में सरकार को जवाब देते देख जनता अपने को जीतता हुआ महसूस करती है।लेकिन क्या आज सरकार से वो सवाल पूछे जाते हैं जिससे असल में जनता जीत रही है ? उन सवालों का क्या जिसकी समझ जनता को सीधे तौर पर तो नहीं होती है लेकिन उसे किसी पत्रकार को पूछना चाहिए था ? आइये हम आज के पत्रकारों को समझने की कोशिश करते हैं और फिर ये फैसला करते हैं की हम जीत रहे हैं या हार रहे हैं।


जब भी कोई राजनैतिक पार्टी आती है तो वो अपने साथ कुछ वादों का पिटारा लाती है,जिसे पूरा करना ना सिर्फ उसका कर्त्तव्य है बल्कि उनका राजधर्म है।लेकिन अगर सत्ताधारी पार्टी इस दिशा में काम ना कर रही हो या जनता को धोखा दे रही हो तो ऐसे स्थिति में जनता क्या करे क्योंकि वोट तो अब वो अगले चुनाव में ही दे पायेगा।ऐसे समय पत्रकारों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है की वो हर मुलाक़ात में माननीय नेताजी से ये सवाल करे की वो अपना किया वादा क्यों नहीं निभा रहे हैं।पत्रकारों को चाहिये की नेताजी का घर से बाहर निकलना मुश्किल कर दे क्योंकि उनको ये भय होगा की कोई पत्रकार उनसे ये ना पूछ ले की 3 साल हो गए अभी तक क्यों नहीं जनता से किया वादा निभाया आपने ? अब आप अपने दिल पर हाथ रख के बताइये क्या आज का पत्रकार ऐसा कर रहा है ?


आज नेताओं के पास वादों से मुकरने का और झूठ बोलने की सुविधा है,क्योंकि उनको पता है की आज के सुविधा की पत्रकारिता करने वाले लोग मुझ तक जनता के सवाल पहुँचने ही नहीं देंगे।उनको पता है की जब मुद्दा ये होना चाहिए की वादा क्यों नहीं निभाया तब मुद्दा ये होगा की विपक्ष ने आवाज़ क्यों उठाई।मुद्दे और सवाल सत्तादारी लोग तय करेंगे और पत्रकार सिर्फ एक राजनीति की खानापूर्ति बन के रह जाएंगे।आज के पत्रकारों में मुद्दों पर दोहरी नीति और दोहरा मापदंड साफ दीखता है।जनता तक कोई भी सत्ताधारी लोगों के लिये असुविधा जनक खबर अधूरी पहुंच रही है या उसका स्वरूप ही बदल दिया गया होता है।

आज की पत्रकारिता को समझना है तो एक तरीका मैं आपको सुझाता हूँ।आपको जो भी राजनितिक पार्टी नहीं पसंद है उसका नाम एक कागज़ पर लिख लीजिये।उसके बाद वो मुद्दा उठाइये जो आपको सबसे ज्यादा नापसंद हो,फिर उसी कागज़ पर उस मुद्दे को कड़े सब्दों में एक सवाल बनाइये और उस पार्टी से पूछिये।अब उसके नीचे उस राजनितिक पार्टी का नाम लिखिए जो आपको सबसे ज्यादा पसंद हो और वही सवाल उनसे पूछिये।जवाब किसने क्या दिया ये नोट कर लें और फिर इन पत्रकारों के प्रोग्राम को देखिये और वो किनसे क्या सवाल पूछ रहें है और कौन सी पार्टी क्या जवाब दे रही है इसपर ध्यान दीजिये।आपको इन चाटुकार पत्रकारों की पहचान हो जायेगी।


सवाल हमें भी खुद से पूछना है की हम ऐसे पत्रकारों के कार्यक्रम क्यों देखें जो किसी राजनितिक पार्टी से या तो सीधे लाभांन्वित हैं या अप्रत्यक्ष रूप से साथ काम कर रहे है।जो सत्ताधारी प्रवक्ता से आसान सवाल पूछे और उल्टा विपक्ष से जवाब मांगे,जबकि होना इसका ठीक विपरीत चाहिए।पत्रकार जनता के सवाल नेता से पूछें,खुद जनता को ना बताये की क्या सवाल होने चाहिए,जैसा की आज ज्यादातर पत्रकार करने में लगे हैं।धीरे-धीरे हम सब ऐसे पत्रकरों को पहचाने और उनको अपने से ब्लैकआउट करें ताकि सही लोगों से सही सवाल पूछने वालो को हिम्मत मिले और देश के विकाश में तेज़ी लाया जा सके।
  
                                - बेकार मिर्ज़ापुरी।

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