Saturday, 13 May 2017

कपिल मिश्रा जी को उनके एक सुभचिन्तक और आम आदमी पार्टी के साधारण कार्यकर्त्ता का खुला पत्र।




आदरणीय कपिल मिश्रा जी।

 मैं आपका एक बहुत बड़ा समर्थक था।पूरे अरविन्द मंत्रिमंडल में आप मेरे सबसे पसंदीदा मंत्री थे।मैं हमेशा यहीं मानता था की आप बड़ी मछली हैं और दिल्ली में मंत्रीपद आपको रोकने जैसा है।आपका कार्यक्षेत्र पूरा देश होना चाहिए था संघटन में आप बहुत ही अच्छा काम कर सकते थे,ऐसा मेरा मनना था।

हाल के ताज़ा घटनाक्रम के बाद मैं ये पत्र आपको इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि,आप बार-बार ये कह रहे हैं की मैं आम आदमी पार्टी की सफाई के लिए ये सब कर रहा हूँ और मैं पार्टी में बना रहना चाहता हूँ।आज मैं आपसे बात तो कर रहा हूँ,लेकिन मैं आपके द्वरा लगाए इल्ज़ामात को सही-गलत नहीं बोलूंगा,बल्कि एक कार्यकर्त्ता पर क्या गुज़र रही है इसपर बात करूँगा।

आम आदमी पार्टी जब नहीं बनी थी,तब मैं राजनीति को सिर्फ समाचार की चीज़ समझता था।देश में कुछ भी गलत होता देखता था तो सरकार को गाली देते हुए रिमोट से चैनल बदल लेता था।मुझे उस कमरे से निकाल कर सड़क पर आंदोलन करना,गलत चीज़ पर पूरी ताकत से लड़ना,समाज को और राजनीति की सफाई खुद की जिम्मेदारी समझना,ये सब मुझे किसी पार्टी ने नहीं सिखाया,ना ही किसी सामाजिक तानेबाने ने सिखाया।ये सब मुझे समझाया अरविन्द केजरीवाल ने।



अरविन्द केरीवाल मेरी तरह हर कार्यकर्त्ता के प्रेरणास्त्रोत रहे हैं जो अपना सबकुछ त्याग के इस राजनीतक आंदोलन में कूदे थे।मेरा ऐसा मनना है और ये आप मेरे तरफ से अतिसयोक्ति भी समझ सकते है की,इस पार्टी का हर कार्यकर्त्ता,यहाँ तक की हर वोटर तक,सिर्फ और सिर्फ अरविन्द केजरीवाल की वजह से इस पार्टी से जुड़ा है या वोट करता है।आम आदमी पार्टी अरविन्द के द्वारा जलाई विचारधारा की मशाल का सिर्फ इसका एक संघटित ढांचा भर है।

मैं एक कार्यकर्त्ता के तौर पर जब भी इस भ्रस्ट व्यवस्था की तरफ देखता हूँ,तो वो मुझे इतनी बड़ी और विशालकाय दिखती है की मैं अपने आप को उससे जीत के उसे बदलने में समर्थ महसूस नहीं करता हूँ,लेकिन उसी समय जब अरविन्द जी पर नज़र जाती है तो एक उम्मीद की किरण जागने लगती है।अकेले तो उनसे अरविन्द जी भी नहीं लड़ सकते हैं।हम सब इसीलिए इकट्ठे हुए थे की,हम चाहे छोटा या बड़ा जो भी काम हो बस अपना रोल निभाते हुए,अरविन्द जी को बड़े लड़ाई के लिए ताकत प्रदान कर सके।आज मुझे सिर्फ एकमात्र राजनेता दिख रहा है जिसका लक्ष्य व्यवस्था परिवर्तन है,वरना बाकी तो सब चुनावी राजनीति और निजी स्वार्थ तक सीमित हैं। 

कपिल जी आप कह रहे हैं की मैं अपने अंतिम सांस तक लड़ूंगा,तब मैं आपसे पूछना चाहता हूँ की आप कौन सी लड़ाई की बात कर रहे हैं ? जिस लड़ाई की वजह से आप आम आदमी पार्टी में जुड़े थे,या ये लड़ाई जो आजकल आपको लेके समाचार पत्रों में दिखाया जा रहा है।कपिल जी आप मुझे ये समझाइये की आपकी जीत का क्या मतलब है ? वो राजनितिक बदलाव जिसके लिए आप अरविन्द केजरीवाल से जुड़े थे या वो जो मनोज तिवारी और उनके जैसे अन्य भाजपा के नेता आपका सहारा लेके अरविन्द के लिए कह रहे हैं वो ?

जिस तरह सरकार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हर सनघटन या सस्था एकजुट होकर अरविन्द केजरीवाल को हारने में लगा है,इससे मेरा ये विश्वास तो पक्का हो गया है की, अरविन्द जी ने उस भ्रस्ट व्यवस्था के बुनियाद में चोट पहुँचाने में सफल तो हो गए हैं।लेकिन कपिल जी आज मैं आपसे सिर्फ एक सवाल का जवाब चाहता हूँ,अगर ईस्वर ना करे अरविन्द जी ये जंग हार गए तो क्या होगा ? क्या फिर मेरे जीवनकाल में कोई राजनितिक आंदोलन खड़ा होगा ? क्या फिर से लोग काम-धंदे छोड़कर अगली पीढ़ी के लिए लड़ाई करने का साहस दिखा पाएंगे ? क्या ताकतवर लोगों के आँखों में आखे डाल कर कोई उनके गुनाह बताने का दुस्साहस कर पायेगा ?

कपिल जी आप हो सकता है कोई भी बात सिद्ध करना चाह रहे हों,लेकिन इतना तो तय है की सबसे ज्यादा नुक्सान आम आदमी पार्टी को और उसके कार्यकर्ताओं को हो रहा है।इसका सबसे आसान प्रमाण है बीजेपी के प्रवक्ताओं के हर इंटरव्यू में आपका नाम लेके अरविन्द जी को घेरने का प्रयास और आपके ट्वीट्स पे सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के लोगो का लाइक और रिट्वीट।आप के कार्यकर्त्ता तो खुश नहीं है इनसब बातों से इसका सबूत है आपको नहीं मिल रहा समर्थन।आपके साथ आज कौन लोग खड़े हैं,सिर्फ वही जिनको कल तक आप ही भ्रस्ट बताते थे।

अंततः मेरे इस पत्र का निष्कर्ष मैं आपको ये देना चाहता हूँ की ,आप अरविन्द जी पर जो मर्ज़ी इलज़ाम लगाएं,हमें परवाह नहीं,आजतक बहुत इलज़ाम लगा है उनपर एक और सही,बस  आप खुद को आम आदमी पार्टी से अलग कर लीजिये।आप आम आदमी पार्टी के बेहद बुनयादी ज़रूरत भी नहीं समझ सके।मुझे बेहद खेद है की आप आजतक ये नहीं समझ पाये की अरविन्द केजरीवाल ही आम आदमी पार्टी है उनको निकाल के बीजेपी और कांग्रेस के लोग आम आदमी पार्टी की कोई परवाह नहीं करेंगे और आम आदमी पार्टी इस राजनीति के मेले में कहीं खो के रह जाएगा।आप भी बीजेपी-कांग्रेस जैसे हो गए हैं,बस इस बात को आप खुद स्वीकार कर लीजये,क्योंकि पार्टी का हर कार्यकर्त्ता आज आपके विरुद्ध खड़ा है।

                जय हिन्द,जय भारत।


                           - रुद्रेश गौतम,
                         एक आम कार्यकर्त्ता,
                         आम आदमी पार्टी।


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Saturday, 6 May 2017

देश का चौथा स्तंभ क्यों है देश के विकास के खिलाफ।


25 मार्च 1931 में कानपुर में दंगे हो रहे थे।उस समय के सबसे निर्भीक और स्वतंत्र् पत्रकारों में से एक श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी,जो की अपनी कलम से ना सिर्फ अंग्रेज़ो के बल्कि अपने स्वार्थ की राजनीति करने वाले अपने लोगो के खिलाफ भी मोर्चा खोल रखा था,उन्होंने ये अपना कर्तव्य समझा,की मैं गलत अपनी आँखों के सामने होता नहीं देख सकता,चाहे वो अपने लोग ही क्यों ना कर रहे हों।वो अपनी प्रेस से निकल के उस गली में जहां भयानक हिंसा हो रही थी पहुँच गए।लोगों के हथियारों वाले हाथों को रोक कर हाथ जोड़ कर उनको शांत कराने लगे।इसी बीच कुछ सरफिरों ने उनपर भी वार कर दिया जिससे वो मरणावस्था में पहुँच गए।आखिरी पलों में भी वो सभी लोगो से इस संहार को रोकने में लगे रहे।उनकी सहादत के बाद गांधीजी ने कहा - "विद्यार्थी जी की इस एक मौत के बदले मैं अपनी सौ ज़िन्दगी कुर्बान करने को तैयार हूँ।" आज 2017 में भी स्वघोषित निर्भीक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।उनके लेखों और कार्यक्रमों को देखो तो क्या वो विद्यार्थी जी के कहीं आसपास भी नज़र आएंगे ? 

     पत्रकारिता और पत्रकार चौथा स्तंम्भ सिर्फ इसलिए होते हैं क्योंकि वो जनता और सरकार के बीच में पुल का काम करते हैं।जो भी जनता के अंतर-मन में संसय और समस्या होती है वो पत्रकार सीधे सरकार को अपने सब्दों में पूछता है।उन सवालों को सुनते-देखते-पढ़ते हुए जनता खुद को ताकतवर समझती है।ऐसे में सरकार को जवाब देते देख जनता अपने को जीतता हुआ महसूस करती है।लेकिन क्या आज सरकार से वो सवाल पूछे जाते हैं जिससे असल में जनता जीत रही है ? उन सवालों का क्या जिसकी समझ जनता को सीधे तौर पर तो नहीं होती है लेकिन उसे किसी पत्रकार को पूछना चाहिए था ? आइये हम आज के पत्रकारों को समझने की कोशिश करते हैं और फिर ये फैसला करते हैं की हम जीत रहे हैं या हार रहे हैं।


जब भी कोई राजनैतिक पार्टी आती है तो वो अपने साथ कुछ वादों का पिटारा लाती है,जिसे पूरा करना ना सिर्फ उसका कर्त्तव्य है बल्कि उनका राजधर्म है।लेकिन अगर सत्ताधारी पार्टी इस दिशा में काम ना कर रही हो या जनता को धोखा दे रही हो तो ऐसे स्थिति में जनता क्या करे क्योंकि वोट तो अब वो अगले चुनाव में ही दे पायेगा।ऐसे समय पत्रकारों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है की वो हर मुलाक़ात में माननीय नेताजी से ये सवाल करे की वो अपना किया वादा क्यों नहीं निभा रहे हैं।पत्रकारों को चाहिये की नेताजी का घर से बाहर निकलना मुश्किल कर दे क्योंकि उनको ये भय होगा की कोई पत्रकार उनसे ये ना पूछ ले की 3 साल हो गए अभी तक क्यों नहीं जनता से किया वादा निभाया आपने ? अब आप अपने दिल पर हाथ रख के बताइये क्या आज का पत्रकार ऐसा कर रहा है ?


आज नेताओं के पास वादों से मुकरने का और झूठ बोलने की सुविधा है,क्योंकि उनको पता है की आज के सुविधा की पत्रकारिता करने वाले लोग मुझ तक जनता के सवाल पहुँचने ही नहीं देंगे।उनको पता है की जब मुद्दा ये होना चाहिए की वादा क्यों नहीं निभाया तब मुद्दा ये होगा की विपक्ष ने आवाज़ क्यों उठाई।मुद्दे और सवाल सत्तादारी लोग तय करेंगे और पत्रकार सिर्फ एक राजनीति की खानापूर्ति बन के रह जाएंगे।आज के पत्रकारों में मुद्दों पर दोहरी नीति और दोहरा मापदंड साफ दीखता है।जनता तक कोई भी सत्ताधारी लोगों के लिये असुविधा जनक खबर अधूरी पहुंच रही है या उसका स्वरूप ही बदल दिया गया होता है।

आज की पत्रकारिता को समझना है तो एक तरीका मैं आपको सुझाता हूँ।आपको जो भी राजनितिक पार्टी नहीं पसंद है उसका नाम एक कागज़ पर लिख लीजिये।उसके बाद वो मुद्दा उठाइये जो आपको सबसे ज्यादा नापसंद हो,फिर उसी कागज़ पर उस मुद्दे को कड़े सब्दों में एक सवाल बनाइये और उस पार्टी से पूछिये।अब उसके नीचे उस राजनितिक पार्टी का नाम लिखिए जो आपको सबसे ज्यादा पसंद हो और वही सवाल उनसे पूछिये।जवाब किसने क्या दिया ये नोट कर लें और फिर इन पत्रकारों के प्रोग्राम को देखिये और वो किनसे क्या सवाल पूछ रहें है और कौन सी पार्टी क्या जवाब दे रही है इसपर ध्यान दीजिये।आपको इन चाटुकार पत्रकारों की पहचान हो जायेगी।


सवाल हमें भी खुद से पूछना है की हम ऐसे पत्रकारों के कार्यक्रम क्यों देखें जो किसी राजनितिक पार्टी से या तो सीधे लाभांन्वित हैं या अप्रत्यक्ष रूप से साथ काम कर रहे है।जो सत्ताधारी प्रवक्ता से आसान सवाल पूछे और उल्टा विपक्ष से जवाब मांगे,जबकि होना इसका ठीक विपरीत चाहिए।पत्रकार जनता के सवाल नेता से पूछें,खुद जनता को ना बताये की क्या सवाल होने चाहिए,जैसा की आज ज्यादातर पत्रकार करने में लगे हैं।धीरे-धीरे हम सब ऐसे पत्रकरों को पहचाने और उनको अपने से ब्लैकआउट करें ताकि सही लोगों से सही सवाल पूछने वालो को हिम्मत मिले और देश के विकाश में तेज़ी लाया जा सके।
  
                                - बेकार मिर्ज़ापुरी।

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